मानसून में बदलाव को लेकर सामने आई कई चौंकाने वालीं बातें, सोमालिया से जुड़ा लिंक

मौसम के बदलते स्वरूप के बीच न केवल साल दर साल मानसून देश में देरी से दस्तक दे रहा है, बल्कि मानसून के पूर्व और बाद की बारिश भी कम होने लगी है। मानसून के पैटर्न में आ रहे इस बदलाव पर गौर करें तो बहुत से चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। अरब सागर से मानसून उठने की शुरुआती स्थिति ही बिगड़ने लगी है। वृहद परिप्रेक्ष्य में समस्या की जड़ जलवायु परिवर्तन ही पता चल रही है।


भारतीय मौसम विभाग से जुड़े विज्ञानियों के अनुसार मानसून के समय पर पहुंचने के लिए आवश्यक है कि दक्षिणी गोलार्ध में उच्च दबाव का क्षेत्र बड़े दायरे और प्रभाव वाला हो। साथ ही सोमालिया कोस्ट से 30 से 35 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार वाली कम दबाव वाली हवाएं भारत की ओर समय से आएं, लेकिन जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से ऐसा नहीं हो पा रहा। यही वजह है कि मानसून की दस्तक और विदाई दोनों देरी से होने लगी है।मौसम विज्ञानी आरके दत्ता सरल शब्दों में बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन के ही कारण धरती पूरी तरह से गर्म नहीं हाे पा रही और आसमान में हवा के निम्न दबाव का क्षेत्र भी नहीं बन पाता। दूसरी तरफ समुद्र में हवाओं का रुख लगातार गर्म हो रहा है। इसी से अलनीनो प्रभावी होता है और अच्छी वर्षा में बाधक बनता है। आरके दत्ता के मुताबिक, जब धरती गर्म होती है और समुद्र से ठंडी हवाएं आती हैं तो आसमान में हवा के निम्न दबाव का क्षेत्र बनता है। हवा का दबाव पाकर बादल बनते भी हैं और अच्छे से बरसते भी हैं।प्रादेशिक मौसम विज्ञान विभाग के प्रमुख कुलदीप श्रीवास्तव बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन से मौसम चक्र बहुत हद तक प्रभावित हो रहा है। गर्मी का दायरा बढ़ रहा है, जबकि सर्दी व वर्षा ऋतु का घट रहा है। देश में दक्षिणी पश्चिमी मानसून केवल देरी से ही नहीं आ रहा अपितु बारिश के दिन भी कम हो गए हैं। जून से सितंबर के बीच पहले जहां 80 से 100 दिन तक बारिश होती थी वहीं अब यह आंकड़ा बमुश्किल 40 से 60 दिन का रह गया है।